आज हम इंस्पेक्शन एंड टेस्टिंग ऑफ कास्टिंग एंड फोर्जिंग के बारे में जानेंगे आईये इसे हम आसान भाषा में समझने कि कोशिश करते हैं
आप सभी ने अपने घरों में देखा होगा गर्मी के दिनों में हम फ्रिज में बर्फ जमाते है उसके लिए हम पानी को एक ट्रे में डाल कर फ्रिज में रख देते है और जब वह जम जाता है तो वह पानी ट्रे के खंडो के आकर ले कर बाहर आता है।
उसी तरह हमने यह भी देखा है कि मां लोग गुंथे आटे को बेलन से बेल बेल कर रोटी का आकार देती है। यह जो दोनों बाते मैने आपको बताई है यह तो हम सभी जानते हैं पर क्या आप यह जानने की कोशिश करेंगे कि धातुओं को भी इसी तरह कई रूपों में आकार दिया जाता है। आगे हम इसी के बारे में चर्चा करेंगे।
० कास्टिंग –
जब किसी भी धातु चाहे वह लोहा हो या एल्यूमिनियम को आकार देने के लिए उसे पिघलाकर सांचे में डाल कर जो रूप दिया जाता है उसे हम कास्टिंग कहते हैं। जैसे पानी से बर्फ जमाना।
० फोर्जिंग –
जब किसी धातु को पीट पीट कर कोई आकर दिया जाता है तो इसे फोर्जिंग्स कहते है इसे सरल शब्दों में समझने के लिए ऊपर रोटी का जो उदाहरण दिया गया है वह एक दम सही है।
इन दोनों प्रकिया में उत्पाद के सही और सुरक्षित बनने की जाँच के लिए इंस्पेक्शन और टेस्टिंग की जाती है।

० इंस्पेक्शन और टेस्टिंग क्यों जरूरी है????
उत्पाद एक लम्बे समय तक चले और सही तरीके से काम करे इसके लिए बनाते समय उसमें कुछ कमी ना रह जाए इसलिए इंस्पेक्शन और टेस्टिंग जरूरी है उत्पाद बनाते समय कुछ कमियां रह जाती है जैसे…….
1 दरारे –
धातु से वस्तु का निर्माण करते समय उसमें कोई दरार तो नहीं रह गई यह पता करने के लिए इंस्पेक्शन किया जाता है ताकि उसे ठीक किया जा सके।
2 हवा का फस जाना –
धातु में अगर बनाते समय हवा फस जाए तो उसके उपयोग के समय उसमें बुलबुले उठेंगे जो कि उसका उपयोग करने में बाधा उत्पन्न करेंगे इसलिए इन बुलबुलों की जाँच की जाती है कि कही हवा तो नहीं फस गई।
3 आकर में गड़बड़ी –
इंस्पेक्शन इसलिए भी किया जाता है कि यह देखा जाए कि वस्तु का निर्माण जिस रूप में होना था उसी रूप में हुआ है कि नहीं, उसके आकर में कही कोई गड़बड़ी तो नहीं हो गई।
० इंस्पेक्शन और टेस्टिंग के तरीके????
इंस्पेक्शन और टेस्टिंग के लिए कई तरीके उपयोग में लिए जाते है जिनमें से कुछ निम्न है –
बिना नुकसान पहुंचाए धातु को चेक करना
1 देखकर जाँच करना –
इसमे वस्तु को आँखों से देख कर चेक किया जाता है कि कही वस्तु में कोई गड़बड़ी तो नहीं है यह वास्तु कि ऊपरी जाँच के लिए ठीक है।
2 डाई पेनिट्रेंट टेस्टिंग –
इसमें वस्तु में दरारें पता करने के लिए वस्तु की सतह पर एक विशेष प्रकार का डाई लगाया जाता है और फिर लाइट से देखा जाता है अगर दरार होगी तो वह डाई दिख जाएगी इस तरह दरार की जाँच की जाती है।
3 अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग –
इसमे ध्वनि तरंगों के माध्यम से वस्तु की कमियों का पता लगाया जाता है वस्तु पर तरंगें डाली जाती है ओर उन तरंगों के बदलाव से वस्तु में कमी का पता लगाया जाता है।
4 रेडियोग्राफी टेस्टिंग –
इसमें रेडियो तरंगों के माध्यम से कमियों का पता लगा कर उन्हें सुधारा जाता है इसमें गहराई की दरारों जो आसानी से नहीं दिखती उनका पता लगाया जाता है।
धातु को तोड़कर की जाने वाली जाँच
1 टेन्सइल टेस्टिंग –
इस टेस्ट में वस्तु के खिंचाव की जाँच की जाती है कि वस्तु टूटने से पहले कितना खिंचाव सहन करे सकती है इसकी जाँच में उपयोग किया जाने वाला सैंपल फिर किसी काम का नही रहता इसमें वस्तु को तब तक खींचा जाता है जब तक कि वह टूट ना जाए।
2 कठोरता जाँच –
इसमें वस्तु की मजबूती को चेक किया जाता है इसमें वस्तु को खींचा नहीं जाता बल्कि इसमें वस्तु पर स्टील की बाल या हीरे की नोक से दबाव डाला जाता है यह देखने के लिए कि यह कितना दबाब सह सकती है।
3 इम्पैक्ट टेस्ट –
इसमें वस्तु की भंगुरता की जाँच की जाती है कि यह वस्तु शीशे की तरह टूट तो नहीं रही इसमें यह भी देखा जाता है कि वास्तु कितने झटके सह सकती हैं इसके लिए वस्तु पर हथौड़े से झटके के साथ बार किया जाता है ओर चेक किया जाता है।
निष्कर्ष –
कास्टिंग और फ्रोजिंग की इंस्पेक्शन से वस्तु की कमियों का आसानी से पता चल जाता है जिन्हें समय रहते ठीक किया जा सकता है।